आशीर्वचन

परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज

माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा जी की कृपा के फलस्वरूप इस आध्यात्मिक सिद्धाश्रम पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ है। इस पत्रिका से जुड़ने वाले अपने समस्त शिष्यों, माँ के भक्तों एवं समस्त पाठकगणों को मैं अपना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करता हूँ। पत्रिका और पाठकों का सम्बन्ध जल और मीन के समान होता है। जिस प्रकार जल के बिना मीन का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार किसी भी पत्र-पत्रिका या साहित्य का अस्तित्व तभी तक रहता है, जब तक उससे पाठकवर्ग जुड़ा रहता है।
यह पत्रिका जन-जन में माँ की चेतना जाग्रत् करने, देवत्व का उदय करने तथा आत्मीयता एवं आपसी भाई-चारे को स्थापित करने में अहम भूमिका निभा रही है और सामाजिक बुराइयों को दूर करते हुये नवीन आत्मचेतना से परिपूर्ण खुशहाल भारत के निर्माण में अहम सहयोग प्रदान कर रही है। यह पत्रिका धार्मिक आडम्बरों से मुक्त, अनुभवों से परिपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान के साथ ही समाज के लिये उपयोगी बहुमुखी ज्ञानमार्ग प्रदान करने में सहायक सिद्ध हो रही है।
आज चारांे ओर कलियुग के कुचक्र का तांडव हो रहा है। छल, कपट, झूठ, व्यभिचार, लूटपाट, हत्या, जालसाजी से समस्त समाज, देश व विश्व ग्रसित है तथा पूरी मानवता तड़प रही है। भाई, भाई के खून का प्यासा है। प्रत्येक धर्म अपनी रक्षा के लिये दूसरे धर्म को मिटाकर राख कर देने को तत्पर है तथा प्रत्येक धर्म अपने अनुयायियों का शोषण कर रहा है। धर्म के रक्षक ही उसके भक्षक बन गये हैं। लोगों को धर्म की मूल धुरी का भान ही नहीं है। धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाली पुस्तकें, लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान देने का दम भरती हैं, किन्तु उनका स्तर इतना गिर चुका है कि उन्हें पढ़ने वाले भ्रमित होकर अन्धकार में भटक रहे हैं। लोगों के मन-मस्तिष्क में हजारों अनसुलझे आध्यात्मिक प्रश्न छा चुके हैं, जिसके फलस्वरूप उनमें धर्म के प्रति आस्था की जगह अनास्था भर गई है।
वर्तमान में मनुष्य अपने आपको असहाय महसूस कर रहा है। वह अपने ही कुचक्र में इतना फंस चुका है कि उससे निकल पाना अब उसके वश की बात नहीं रह गई है। वह अपनी पहचान ही भूल चुका है। आश्चर्य होता है इस समाज को देखकर कि क्या यह उसी ‘माँ’ का अंश है, जो अपने तीन रूपों में विभक्त होकर सरस्वती के रूप में ज्ञान देने वाली हैं, लक्ष्मी के रूप में धन-धान्य से पूर्ण करती हैं व काली के रूप में शत्रुओं का संहार करने वाली हैं ? उसी दिव्य शक्ति की संतानें आज अपने ही कर्मों से अज्ञानी, दरिद्र तथा शत्रु बाधाओं से ग्रसित हैं। पूरा समाज, देश एवं विश्व विनाश की कगार पर खड़ा है तथा चारों तरफ हा-हाकार मचा है।
मैं प्रकृति की मूल सत्ता का ही अंश हूँ, माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा का रजकण मात्र हूँ। मैंने उन्हीं की कृपा से उनसे एकाकार किया है, प्रकृतिसत्ता को जाना है, समझा है, पहचाना है और उपर्युक्त स्थितियों से ग्रसित इस अपने आत्मीय समाज को उबारने, बचाने का आशीर्वाद माता भगवती से प्राप्त किया है। मैंने अपना पूर्ण जीवन जनकल्याण में लगाने का निर्णय लिया है और समाज को उस मूल मार्ग में खींचने का प्रयास कर रहा हूँ, जिस पर चलकर ही मनुष्य इस कलियुग की अजेय कारागार से निकल पाने में सफल हो सकता है। मेरा पूर्ण जीवन साधनात्मक है। समाज के बीच 108 महाशक्तियज्ञों को सम्पन्न करके कलियुग की भयावहता से ग्रसित मानवता को मुक्ति दिलाने का मेरा पूरा प्रयास है।
इस सिद्धाश्रम पत्रिका के प्रकाशन एवं व्यवस्था से सम्बन्धित समस्त जिम्मेदारियां योग्य, सक्षम, कर्मठ, पात्र एवं अनुभवी हाथों में सौंपी गई हैं। यह पत्रिका जहाँ आपको समस्त आध्यात्मिक एवं सामाजिक मार्गदर्शन प्रदान करेगी, वहीं मेरे विचारों एवं चिन्तनों से आपके और मेरे संबंधों को भी बराबर जोड़कर रखेगी। यह पत्रिका भारत की मूल धरोहर आध्यात्मिक संस्कृति की रक्षा करेगी, समाज को चेतनावान्, सामर्थ्यवान् एवं आत्मावान् बनायेगी और कलियुग की भयावहता को नष्ट करके सतयुग की स्थापना करने में अहम भूमिका निभायेगी।

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।